Tuesday, March 24, 2026
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Scheme for Care and Support to Victims of under Section 4 and 6 of POCSO Act 2012

Scheme for Care and Support to Victims of under Section 4 and 6 of POCSO Act 2012 भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संचालित एक नयी योजना है। जिसे वर्ष 2023 में प्रारंभ किया गया है। उत्तर प्रदेश में इस योजना का संचालन महिला कल्याण विभाग के द्वारा किया जाता है। अन्य राज्यों में मिशन वात्सल्य योजना से संबंधित विभागों के माध्यम से यह योजना संचालित की जा रही है। इस लेख के माध्यम इस योजना के बारे में समस्त जानकारी विस्तृत रूप से देने का प्रयास किया गया है।

Scheme for Care and Support to Victims of under Section 4 and 6 of POCSO Act 2012 की पृष्ठभूमि

18 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को लैंगिक अपराधों से बचाव प्रदान करने हेतु लैंगिक अपराधों से बच्चों का संख्क्षण (पॉक्सो) अधिनियम 2012 बना था, जिसे 2019 में संशोधित किया गया है। समाज में लैंगिक अपराध, पीड़ितों हेतु सामाजिक कलंक से जुड़े होते हैं. इसलिए पीड़ितों को न्याय नहीं मिलने के कारण बड़ी संख्या में प्रकरण दर्ज ही नहीं हो पाते हैं। हालाँकि, पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत अनिवार्य रिपोर्टिंग के प्रावधान होने के कारण, प्रकरणों की रिपोर्टिंग में वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों के दौरान पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 4 और 6 के अंतर्गत औसतन 29,472 प्रकरण दर्ज किए गए हैं। इनमें से औसतन 20,188 प्रकरणों में पीड़ित बालिकायें हैं। ये पीड़ित बालिकायें अक्सर समय पर सहायता और समर्थन प्राप्त करने में विफल रहती हैं। इसलिए, इन्हें प्राथमिकता दिये जाने की की आवश्यकता है।

इसके अतिरिक्त, पॉक्सो अधिनियम की धारा 4 और धारा 6 में बलात्कार का अपराध आच्छादित है जिसमें सजा सबसे गंभीर होती है। इनमें से कई प्रकरणों में, बालिकायें गर्भवती हो जाती हैं और वह कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं से जूझती हैं। जो तब और बढ़ जाती है जब उन्हें उनके अपने परिवारों द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है या त्याग दिया जाता है या अनाथ कर दिया जाता है। केंद सरकार द्वारा वित्त पोषित यह योजना निर्भया निधि से पीड़ित नाबालिग गर्भवती बालिकाओं के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान करने और मौजूदा योजनाओं के कमियों को पूरा करने के उददेश्य से शुरू की गयी है।

योजना का उद्देश्य

  • पीडित नाबालिग गर्भवती बालिकाओं को एक ही छत के नीचे एकीकृत सहायता उपलब्ध कराना ।
  • पीड़ित बालिकाओं के दीर्घकालीन पुर्नवास हेतु विभिन्न विभागों के समन्यव से समेकित सहायता उपलब्ध कराना।
  • पीड़ित बालिका को एक छत के नीचे आपातकालीन और गैर-आपातकालीन पहुंच की सुविधा प्रदान करना।

योजना की पात्रता एवं शर्तें

  • 18 वर्ष से कम आयु की कोई भी बालिका जो पॉक्सो अधिनियम 2012 की धारा—4 या 6 या आईपीसी, 1860 की धारा 376, 376ए-ई में पीड़ित हो ऐसे लैंगिक हमले या बलात्कार के कारण गर्भवती हो जाती है, वह योजना से आच्छादित होगी।
https://vikasbhawan.com/2024/04/07/up-bal-seva-yojana/

योजना के अंतर्गत पीड़ित बालिकाओं को प्रदान की जाने वाली सुविधायें

महिला एवं विकास विभाग के अधीन संचालित बाल देखरेख संस्थाओं यथा बाल गृह या किसी पृथक स्थान निर्मित / चिन्हित किया जायेगा, जिससे 18 वर्ष की आयु तक ऐसी पीड़ित बालिकाओं को आवास व उसके बाद 23 वर्ष तक की देखरेख सहायता प्रदान की जा सके। आवश्यकतानुसार इन बालिकाओं को 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के उपरांत संस्थागत देखभाल हेतु शक्ति सदन/सखी निवास से जोड़ा जा सकता है।

इसके अंतर्गत चिकित्सा एवं परिवार कल्याण विभाग के माध्यम से पीड़ित बालिकाओं को संस्थागत प्रसव सहित प्रसवपूर्व, प्रसवोत्तर देखभाल और गर्भावस्था के दौरान व प्रसव के बाद नाबालिग बालिकाओं का उचित पोषण जैसी प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं शामिल है। इसमें जननी सुरक्षा योजना, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, प्रधान मंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान या केंद्र और राज्य सरकार की किसी भी अन्य प्रासंगिक योजना की तर्ज पर इस योजना के अंतर्गत लाभ प्रदान किया जाएगा।

ऐसी पीड़ित गर्भवती बालिका को चिकित्सा सहायता/जांच के लिए निकटतम सरकारी / निजी अस्पताल संदर्भित किया जायेगा, जो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा विकसित दिशा-निर्देशों और प्रोटोकॉल के अनुसार किया जाएगा।

यदि पीडित बालिका 12 वर्ष से कम उम्र की है, तो बाल कल्याण समिति उसके चिकित्सीय परीक्षण के लिए सहमति देगी, लेकिन यदि पीडित बालिका 12 वर्ष से अधिक उम्र की है, तो किसी भी मेडिकल जांच के लिए बालिका की सहमति आवश्यक है। यदि वह चिकित्सीय परीक्षण के लिए मना करती है, तो डॉक्टर को परीक्षण और साक्ष्य संग्रह के महत्व को समझाना चाहिए, हालांकि अंततः उसके इनकार का सम्मान किया जाएगा। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि ऐसी जांच से इंकार करने से उपचार या लाभ की प्राप्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। जांच और साक्ष्य संग्रह के लिए इस तरह के ‘सूचित इनकार’ को प्रलेखित किया जाना चाहिए।

यदि ऐसी पीड़ित बालिका अपनी गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती है, तो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एम०टी०पी०) अधिनियम, 1961 और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के अंतर्गत उपलब्ध विकल्पों को उचित परामर्श के साथ समझाया जाएगा।

ऐसे पीड़ित बालिकाओं को मानसिक आधात से उबरने के लिए परामर्श और अन्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाएंगी जिससे वे न्याय पाने के प्रति आश्वस्त हो सकें।

जनपद में जिला मजिस्ट्रेट माध्यम से संबंधित विभाग यह सुनिश्चित करेंगे कि ऐसी सभी पीड़ित बालिकाओं को उनकी उम्र और शिक्षा स्तर के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाए या जारी रखी जाए और यदि कोई पीड़िता कोई औपचारिक शिक्षा या कोई व्यावसायिक कौशल हासिल करना चाहती है तो उसे भी उनकी रुचि और विकल्प के अनुसार प्रदान किया जाएगा।

जनपद में मिशन वात्सल्य के अंतर्गत गठित जिला बाल संरक्षण इकाई तथा बाल देखरेख संस्था यह सुनिश्चित करेंगे कि ऐसी पीड़ित बालिकाओं को न्यायालय, चिकित्सालय, विद्यालय या किसी अन्य स्थान पर आने-जाने के दौरान पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ परिवहन सहायता/सुविधा प्रदान की जाए। जहां भी और जब भी पीड़िता की सुरक्षा को खतरा होगा, पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

इन पीड़ित बालिकाओं की न्याय तक पहुंच आसान बनाने हेतु जिला विधिक सेवा प्राधिकरण(DLSA) के माध्यम से कानूनी सहायता और परामर्श प्रदान किया जाएगा। जिला बाल संरक्षण इकाई(DCPU) तथा बाल देखरेख संस्था (वकील के माध्यम से) बाल कल्याण समिति (CWC) से ऐसी पीडिता हेतु एक सहायक व्यक्ति नियुक्त करने का अनुरोध कर सकते हैं। पॉक्सो अधिनियम 2012 (2019 में संशोधित) के नियम 4 और 5 के अनुसार, पीड़ित बालिका को कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में समर्थन और मार्गदर्शन करना सहायक व्यक्ति/वकील/अभियोजक का दायित्व होगा।

बाल गृह/बाल देखरेख संस्था यह सुनिश्चित करेगी कि पीड़ित बालिका का बयान पुलिस द्वारा उसकी पसंद के स्थान पर एक महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाए जो सादे कपड़ों में हो। दुभाषिया, वीडियो रिकॉर्डिंग की पर्याप्त व्यवस्था की जाएगी जिससे पीड़िता को दोबारा अपनी बात दोहरानी न पड़े।

बाल देखरेख संस्था/वकील/सहायक व्यक्ति, पीड़िताओं की, कानून और केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं के अनुसार वित्तीय और अन्य अधिकारों तक पहुंच प्रदान करेगें, जिसमें विशेष रूप से राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NLSA) की लैंगिक हमलों/अन्य अपराधों से महिला पीड़िताओं/उत्त्तरजीवियों हेतु क्षतिपूर्ति योजना 2018 के अंतर्गत क्षतिपूर्ति भी शामिल है। उत्तर प्रदेश में उ0प्र0 रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना से भी लाभांवित किया जाता है।

पीड़ित बालिका और उसके नवजात शिशु को प्रधानमंत्री-जन आरोग्य योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा कवर प्रदान किया जाएगा।

प्रत्येक पीड़ित नाबालिग गर्भवती बालिका को संस्थागत देखरेख सहित गैर-संस्थागत देखभाल हेतु मिशन वात्सल्य के अंतर्गत 23 वर्ष की आयु तक Rs. 4,000 प्रति माह प्रदान किये जायेंगे। यदि आधार आई०डी० उपलब्ध नहीं है, तो जिला बाल संरक्षण इकाई द्वारा पीड़ित बालिका और उसके बच्चे की पहचान (जैसा भी प्रकरण हो), प्रत्येक पीड़ित बालिका का आधार कार्ड पंजीकरण कराया जायेगा। नवजात शिशु को भी आधार कार्ड के लिए पंजीकृत कराया जाएगा। जिला बाल संरक्षण इकाई बच्चे के जन्म का पंजीकरण और सक्षम प्राधिकारी द्वारा बच्चे को जन्म प्रमाण पत्र जारी कराना भी सुनिश्चित करेगी।

बाल कल्याण समिति, पॉक्सो अधिनियम की धारा 19 की उप-धारा (6) के अंतर्गत रिपोर्ट प्राप्त करने पर या उप नियम (5) के अंतर्गत किए गए मूल्यांकन के आधार पर, और बच्चे और बच्चे के माता-पिता या अभिभावक या ऐसे व्यक्ति की सहमति से जिस व्यक्ति पर बच्चे को भरोसा और विश्वास है, जांच और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चे को हर संभव तरीके से सहायता प्रदान करने हेतु एक सहायक व्यक्ति प्रदान करेगी और सहायक व्यक्ति प्रदान किये जाने हेतु विशेष किशोर पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को सूचित करेगी। विशेष किशोर पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस ऐसी सूचना प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर बच्चे को सहायक व्यक्ति के बारे में सूचित करेगी और विशेष न्यायालय को लिखित रूप में सूचित करेगी।

सहायक व्यक्ति, बच्चे से संबंधित सभी जानकारियों, जिन तक उसकी पहुंच है की की गोपनीयता बनाए रखेगा और बच्चे और बच्चे के माता-पिता या अभिभावक या ऐसे व्यक्ति जिस पर बच्चे को भरोसा और विश्वास है, को कार्यवाही के संबंध में सूचित रखेगा जिसमें उपलब्ध सहायता, न्यायिक प्रक्रियाओं और संभावित परिणामों सहित प्रकरण का विवरण शामिल है। सहायक व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका के बारे में भी बच्चे को सूचित करना होगा। सहायक व्यक्ति यह भी सुनिश्चित करेगा कि आरोपी के संबंध में बच्चे की सुरक्षा के दृष्टिगत बच्चे की कोई भी चिंताया जिस प्रकार से बच्चा अपने बयान दर्ज कराना थाहता है, के संबंध में संबंधित अधिकारियों को सूचित किया जाये।

योजना का लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया

योजना पूर्णत: आफ लाइन है। देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों को किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (संशोधित 2021) की धारा 27 के अंतर्गत गठित बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। समिति के पास बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, उपचार, विकास और पुनर्वास साथ-साथ उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने हेत प्रकरणों को निपटाने का अंतिम अधिकार है। देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले किसी भी बच्चे को निम्नलिखित व्यक्तियों में से किसी एक द्वारा समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है:-

  1. कोई पुलिस अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई या नामित बाल कल्याण पुलिस अधिकारी या जिला बाल संरक्षण इकाई का कोई अधिकारी या किसी श्रम कानून के अंतर्गत नियुक्त निरीक्षक,
  2. कोई भी लोक सेवक,
  3. चाइल्ड हेल्पलाइन सेवाएँ या कोई स्वैच्छिक या गैर-सरकारी संगठन या कोई एजेंसी जिसे राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हो;
  4. बाल कल्याण अधिकारी या परिवीक्षा अधिकारी;
  5. कोई भी सामाजिक कार्यकर्ता या सार्वजनिक-उत्साही नागरिक,
  6. स्वयं बच्चे द्वारा, या
  7. कोई नर्स, डॉक्टर या नर्सिंग होम, अस्पताल या प्रसूति गृह का प्रबंधन

किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 29 के अंतर्गत, समिति के पास देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, उपचार, विकास और पुनर्वास के प्रकरणों का निपटान करने और उनकी बुनियादी जरूरतों और संरक्षण को भी प्रदान किये जाने का अधिकार है। मिशन वात्सल्य योजना के अंतर्गत कोई भी पीडित बालिका बाल कल्याण समिति के आदेश से सी०सी०आई० के माध्यम से संस्थागत देखरेख या गैर-संस्थागत देखभाल का लाभ प्राप्त कर सकती है (यदि कोई पीड़ित बालिका माता-पिता/अभिभावकों या विस्तारित परिवार के साथ रहने का विकल्प चुनती है)। इसके बाद पीड़ित बालिका मिशन वात्सल्य योजना की गैर-संस्थागत देखभाल के अंतर्गत आपटरकेयर की सुविधा का लाभ भी प्राप्त कर सकती है।

कोई भी पीड़ित बालिका निम्नलिखित तरीके से बाल कल्याण समिति (सी०डब्ल्यू०सी०) के समक्ष उपस्थित होकर योजना के अंतर्गत लाभ प्राप्त कर सकती है:

  • स्वंयः या
  • किसी भी व्यक्ति के माध्यम से जिसमें कोई भी सार्वजनिक-उत्साही नागरिक, लोक सेवक (जैसा कि भारतीय दंड संहिता, 1800 की धारा 21 के अंतर्गत परिभाषित है), रिश्तेदार, मित्र, एन०जी०ओ०, स्वयंसेवक, आदि शामिल हैं, या
  • चाइल्ड हेल्पलाइन, महिला हेल्पलाइन, एम्बुलेंस और अन्य आपातकालीन प्रतिक्रिया हेल्पलाइन/वन स्टॉप सेंटर (ओ०एस०सी०)/बाल देखरेख संस्था (सी०सी०आई०) / जिला बाल संरक्षण इकाई (डी०सी०पी०यू०) आदि के माध्यम से।
  • यदि बालिका DCPU, Child Helpline, CCIs या One Stop Centre से संपर्क करती है तो वह तुरंत पुलिस को जानकारी प्रदान करेंगे और बालिकाओं हेतु संचालित बाल देखरेख संस्थाओं में प्लेसमेंट के लिए बालिका को बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

योजना का संचालन

इस योजना का संचालन और समीक्षा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा निर्भया फंड के अंतर्गत 100 प्रतिशत केंद्र वित्तपोषित योजना के रूप में की जायेगी। योजना, जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से कार्यान्वित की जाएगी। योजना में मंत्रालय से राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को पॉक्सो योजना की पीड़िताओं की देखरेख और सहायता हेतु वित्त के हस्तांतरण के लिए अलग बजट लाइन और राज्य से जुड़ी योजना (एस०एल०एस०) होगी। उत्तर प्रदेश में योजना का कार्यान्वयन राज्य स्तर पर प्रमुख सचिव/सचिव, महिला एवं बाल विकास विभाग, उ०प्र० शासन और जनपदों में मिशन वात्सल्य दिशा-निर्देशों के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट / जिलाधिकारी द्वारा किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश में मिशन वात्सल्य योजना का संचालन महिला कल्याण विभाग द्वारा इस योजना का संचालन किया जाता है। जनपद स्तर पर इसके नोडल जिला प्रोबेशन अधिकारी होेते हैं।

योजना के अंतर्गत आर्थिक सहायता

केंद्र सरकार, प्रदेश सरकार को धनराशि जारी करेगी और उसके बाद धनराशि जारी की जाएगी व जिलाधिकारियों को उपलब्ध कराई जाएगी।

उक्त निधि प्रत्येक जनपद में जिला बाल संरक्षण अधिकारी द्वारा बाल गृह को जारी की जाएगी। यह मिशन वात्सल्य के अंतर्गत सी०सी०आई० के प्रबंधन /प्रशासन के लिए जारी धनराशि के अतिरिक्त और पृथक होगी। मिशन वात्सल्य योजना के अंतर्गत गैर-संस्थागत देखभाल (स्पॉसरशिप और पश्चातवर्ती देखरेख) सहायता प्रदान करने के लिए इन पीड़ित बालिकाओं के आधार से जुड़े बैंक खातों में रुपये 4000/- प्रति बालिका की मासिक धनराशि प्रेषित की जायेगी।

Rs. 6000 की दर से एकमुश्त वित्तीय सहायता प्रदान करना। (नाबालिग गर्भवती बालिका के आधार से जुड़े बैंक खाते में प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के अंतर्गतं गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं (पी०डब्ल्यू० एंड एल०एम०) हेतु निर्धारित लाभ के बराबर।)

पीड़ित बालिकाओं के माइनर बैंक खाता

बाल देखरेख संस्था में निवासरत् बालिकायें नाबालिग होंगी, इसलिए, उनके बैंक खाते बाल देखरेख संस्था के अधीक्षक/प्रभारी अधिकारी की संरक्षकता में खोले जायेंगें। यदि कोई बालिका माता-पिता/परिवार के सदस्यों/विस्तारित परिवार के सदस्यों या किसी अन्य रिश्तेदार के साथ रहना पसंद करती है, तो नाबालिग के रूप में उनके बैंक खाते उसके अभिभावक के साथ संयुक्त रूप से खोले जाएंगे। DCPU इन बालिकाओं का आधार कार्ड और आधार से जुड़े बैंक खाते खोलना सुनिश्चित करेगा।

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लेख पूरा पढ़ने के लिए धन्यवाद। यदि इस संबंध में कोई सुझाव या शिकायत हो तो हमें कमेंट के माध्यम से जरूर बतायें। हम इसे बेहतर बनाने का प्रयास करेंगे।

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